किला रायपुर में मिनी ग्रामीण ओलंपिक मेला 1 फरवरी से होगा शुरू, मेले में फिर से होगी बैलगाड़ी दौड़


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लुधियाना के किला रायपुर में होने वाले मिनी ग्रामीण ओलंपिक में बैलगाड़ी दौड़ का रोमांच एक बार फिर से देखने को मिलेगा। किला रायपुर खेल मेले में बैलगाड़ी की दौड़ सबसे बड़ा आकर्षण का केंद्र है। मेला 1 से 3 फरवरी तक चलेगा। कल पंजाब कैबिनेट ने बैलगाड़ी दौड़ के साथ कुत्तों और खरगोश की दौड़ को भी मंजूरी दी है जिसके बाद पंजाब बैलगाडी दौड़ एसोसिएशन ने तैयारियां शुरू कर दी हैं।

ग्रामीण मिनी ओलंपिक के नाम से विख्यात किला रायपुर 83वें वर्ष में प्रवेश करने वाला है। लुधियाना से 30 किलोमीटर दूर स्थित किला रायपुर में ग्रेवाल स्पोट््र्स एसोसिएशन दौड़ का आयोजन करती है। इसके अध्यक्ष ज्ञान ङ्क्षसह ने कहा कि इस फैसले से बैल धावकों ने काफी खुशी है। उन्होंने तैयारियां शुरू कर दी हैं। धावक गुरमेल का कहना है कि मैं अपने बैल गु़ल्लू को काफी समय से तैयार कर रहा हूं, अब बारी एसोसिएशन की थी। मेरा गुल्लू मेले में अपना जलवा दिखाएगा।

मेले में एनिमल बोर्ड की टीमें भेजी जाएंगी

एनिमल बोर्ड ऑफ इंडिया की महासचिव डॉ. नीलम का कहना है कि यह अच्छी पहल है। इससे पहले कर्नाटक सरकार की तरफ से भी जल्लीकट्टू को लेकर अध्यादेश लाया गया था, तब खेल हुआ था। इस इवेंट पर एनिमल बोर्ड ऑफ इंडिया की टीमें बनाकर वहां भेजी जाएंगी, ताकि जानवरों से कोई क्रूरता न हो।

तीन दिन में होंगे 80 इवेंट

ग्रामीण ओलंपिक खेले मेले में खेल के कुल 80 इवेंट होंगे। प्रधान ज्ञान सिंह ने कहा कि इस बार हमें इस मेले को कराने का मौका मिला। 1933 में 5 इवेंट थे। आज इनकी संख्या 80 तक पहुंच चुकी है।

पहले आते थे डेढ़ लाख दर्शक, अब मात्र 25 हजार

ग्रेवाल स्पोट्र्स एसोसिएशन के मुख्य सलाहकार जगबीर ङ्क्षसह निक्कू ग्रेवाल ने कहा कि बैलगाड़ी दौड़ न होने के कारण किला रायपुर खेल मेले का आकर्षण खत्म हो गया था। बैलगाड़ी दौड़ के वक्त कभी इन खेलों को देखने के लिए करीब डेढ़ लाख लोग आते थे, लेकिन दौड़ बंद होने के कारण दर्शकों की संख्या कम होकर 20 से 25 हजार ही रह गई। किला रायपुर खेल 1933 में शुरू हुए, जबकि 1960 के दशक में बैलगाड़ी दौड़ शुरू हुई थी। यहां पर एक साथ चार-चार बैलगाडिय़ां इक्ट्ठा दौड़ती थीं, यही इसके आकर्षण का केंद्र रहीं और देश विदेश में इन खेलें प्रसिद्ध हो गई। 1997 के गणतंत्र दिवस परेड में पंजाब की झांकी में किला रायपुर खेलों को शामिल किया गया था। वहां से भी इनको देश-विदेश में नई पहचान मिली। धावक अपने बैलों को बच्चों की तरह पालते हैं। इन खेलों को देखने के लिए एनआरआइ भी आते हैं।

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