जय जवान जय किसान का नारा देने वाले भारत के पूर्व प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की 14वीं जयंती पर जाने उनसे जुड़ी कुछ रोचक बातें


जय जवान, जय किसान का नारा देने वाले भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री की आज 114वीं जयंती है। देशभक्ति और ईमानदारी का प्रतीक माने जाने वाले शास्त्री जी का जन्म 2 अक्तूबर, 1904 को उत्तर प्रदेश के मुगलसराय में हुआ था। शास्त्री जी ने अपने विचारों और सादगी के जरिए देशवासियों के मन में अपनी एक अमिट छाप छोड़ी। उन्हें आज भी देश के सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री के रूप में याद किया जाता है। 11 जनवरी, 1966 में मरणोपरांत उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।

कठिनाइयों में बीता जीवन

बचपन में ही शास्त्री जी के पिता की मौत हो गई थी। जिससे उनका बचपन बड़ी ही गरीबी में बीता। बचपन में पढ़ाई के दौरान शास्त्री जी कई मील की दूरी नंगे पांव ही तय कर स्कूल जाते थे। यहां तक की भीषण गर्मी में जब सड़कें अत्यधिक गर्म हुआ करती थीं तब भी उन्हें ऐसे ही जाना पड़ता था। उनके पास नदी पार करने के लिए पैसे नहीं होते थे तो वह तैरकर गंगा नदी पार करते और स्कूल जाते थे।

बदल ली थी अपनी जाति

कायस्थ परिवार में जन्में लाल बहादुर शास्त्री के बचपन का नाम नन्हे था। इसके बाद काशी विद्यापीठ से उन्होंने ‘शास्त्री’ की उपाधि हासिल की और अपने उपनाम श्रीवास्तव को हटाकर शास्त्री कर लिया।

गांधी जी से प्रभावित थे

महात्मा गांधी गांधी ने असहयोग आंदोलन में शामिल होने के लिए देशवासियों से आह्वान किया था, इस समय लाल बहादुर शास्त्री केवल 16 साल के थे। उन्होंने महात्मा गांधी के इस आह्वान पर अपनी पढ़ाई छोड़ देने का निर्णय कर लिया था। उनके इस निर्णय ने उनकी मां की उम्मीदें तोड़ दीं। शास्त्री जी के परिवार ने उनके इस निर्णय को गलत बताते हुए उन्हें रोकने की बहुत कोशिश की लेकिन वे इसमें असफल रहे। लाल बहादुर ने अपना मन बना लिया था। उनके सभी करीबी लोगों को यह पता था कि एक बार मन बना लेने के बाद वे अपना निर्णय कभी नहीं बदलेंगें क्योंकि बाहर से विनम्र दिखने वाले लाल बहादुर अन्दर से चट्टान की तरह दृढ़ थे। जीवन में अनेक संघर्षों के बावजूद 09 जून 1964 को शास्त्री जी भारत के प्रधानमंत्री बने।

लोन पर खरीदी थी कार, पत्नी ने चुकाई किश्तें

शास्त्री जी की ईमानदारी का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्होंने 1965 में फीएट कार खरीदने के लिए पंजाब नेशनल बैंक से पांच हजार रुपए का लोन लिया था। मगर वे लोन की एक किश्त भी नहीं चुका पाए और 1966 में शास्त्री जी का देहांत हो गया। शास्त्री जी के निधन के बाद बैंक ने नोटिस भेजा तो उनकी पत्नी ने अपनी पेंशन के पैसों से कार के लिए लिया गया लोन चुकाने का वायदा किया और फिर उन्होंने ही धीरे-धीरे बैंक के पैसे अदा किए।

जब कश्मीर जाने से किया इंकार

यह बात 1962 के करीब की है, जब शास्त्री जी अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के महासचिव थे। उस समय देश के प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू थे। उन्हें पार्टी के किसी महत्वपूर्ण काम से कश्मीर जाना था। नेहरू ने शास्त्री जी को भी कश्मीर जाने के लिए कहा तो उन्होंने जाने से मना कर दिया। नेहरू के बार-बार कहने पर भी शास्त्री जी नहीं माने। आखिरकार नेहरू ने कहा कि ठीक है शास्त्री जी आप यह तो बता दें कि कश्मीर क्यूं नहीं जाना चाहते, इस पर लल बहादुर कुछ नहीं बोले। लेकिन नेहरू के बार-बार पूछने पर शास्त्री जी ने जो कारण बताया वो सुनकर जवाहर लाल की आंखें भी भर आईं। शास्त्री जी ने बताया कि कश्मीर में ठंड बहुत पड़ रही है और मेरे पास गर्म कोट नहीं है। इतना सुनते ही नेहरू ने उसी समय अपना कोट उन्हें दे दिया। लाल बहादुर शास्त्री जब प्रधानमंत्री बने तो नेहरू के दिए कोट को वे काफी समय तक पहनते भी रहे।

शास्त्री जी के शासनकाल में 1965 का भारत-पाक युद्ध हुआ। इस युद्ध में भारत ने पाकिस्तान को करारी शिकस्त दी। जय जवान-जय किसान का नारा भी इसी दौरान दिया गया। ताशकंद में पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब ख़ान के साथ युद्ध समाप्त करने के समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद 11 जनवरी, 1966 की रात में ही रहस्यमय परिस्थितियों में उनकी मृत्यु हो गई। देश के लोग शास्त्री जी की नेतृत्व क्षमता पर आज भी गर्व करते हैं। राष्ट्रभक्ति के लिए लाल बहादुर शास्त्री देश के हर दिलों में हमेशा जिंदा रहेंगे।

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