युवती के साथ दुष्कर्म और उसे नशे के दलदल में धकेलने वाले डीएसपी को लेकर सिमरजीत सिंह बैंस द्वारा प्रेस वार्ता का आयोजन


कपूरथला के डीएसपी पर नशे की लत लगाने के आरोप लगाने वाली लुधियाना की लड़की वीरवार को नेता विपक्ष सुखपाल खैहरा और विधायक सिमरजीत बैंस के साथ मीडिया के सामने आई। उसने डीजीपी को लिखे पत्र की कॉपियां सौंपते मांग की कि ऐसे अफसरों पर कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। लड़की ने दावा किया कि इलाज के बाद अब नशे की लत छूट चुकी है। पत्र में लड़की ने कहा, 2011 में घरवालों ने मुझे कॉलेज में डाला था लेकिन मैंने पढ़ाई छोड़ नौकरी कर ली। हॉस्टल में रहने लगी जहां तलाकशुदा रूपिंदर से दोस्ती हुई। वह मुझे अपने साथ घर ले गई। वहीं रूपिंदर के दोस्त अमन से मिली जोकि खुद को एमएलए का बेटा बताता था।

डीएसपी ने कहा – लड़कियों को नशा बेचो पैसा मिलेगा – पीड़ित लड़की

2013 में एक दिन अमन मुझे तरनतारन में एक घर में ले गया। वहां मुझे डीएसपी दलजीत सिंह ढिल्लों से मिलवाया। डीएसपी ने ब्राउन रंग की एक डली दिखाते कहा, ये हेरोइन है। रैप पेपर पर रखकर मुझे पीने को कहा। मुझे हल्की सी उल्टी आ गई। डीएसपी ने कहा, पहली बार ऐसा ही होगा। डीएसपी ने अपना फोन नंबर और थोड़ा नशा भी दिया। लुधियाना लौटकर कई बार नशा लिया। नशा खत्म हुआ तो मैं और रूपिंदर डीएसपी के घर गए। डीएसपी ने हेरोइन दी। नशा करने के बाद डीएसपी ने मेरा रेप किया। अगले दिन जब हम दोनों जाने लगीं तो मैंने डीएसपी से नशा मांगा तो 5 ग्राम हेरोइन दी। कुछ दिन बाद जब हेरोइन खत्म हुई तो मैंने डीएसपी को फोन करके मांगी तो उन्होंने कहा कि नई लड़कियां लेकर आए और उन्हें हेरोइन बेचकर जो पैसे मिलेंगे उसमें से तुझे हिस्सा मिलेगा। इसी बीच डीएसपी की बदली कपूरथला हो गई। पीड़िता ने कहा, डीएसपी ने मेरी तरह कईयों की जिंदगी बर्बाद की है। उसे सस्पेंड करने की बजाय बर्खास्त किया जाना चाहिए

नशे के कारण पेट में पल रहे बच्चे की भी हो गई मौत – पीड़िता ने बताया कि प्रीत के घर पर उसकी मुलाकात मुल्लांपुर के बलराज से हुई। वह भी नशे का आदी था। हम दोनों पति-पत्नी के रूप में रहने लगे। हमने नशा छोड़ने की बहुत कोशिश की लेकिन कामयाब नहीं हुए। 26 अगस्त 2017 को नशे की लत पूरी नहीं होने पर बलराज ने आत्महत्या कर ली। वह अपने मां बाप का इकलौता बेटा था। उस वक्त मैं 4 महीने की प्रेग्नेंट थी। पुलिस की सूचना पर मेरे घर वालों ने विधायक सिमरजीत सिंह बैंस की मदद से मुझे कपूरथला के ड्रग डी-एडिक्शन सेंटर भेजा और फिर अमृतसर में गुरु नानक अस्पताल में रेफर किया गया। तब तक मेरे पेट में 4 महीने के बच्चे की मौत हो चुकी थी। मैं करीब 6 दिन तक वेंटीलेटर पर रही, बड़ी मुश्किल से जान बची। दोबारा कपूरथला के सेंटर में भर्ती हुई। 8 महीने दवा चलने के बाद ड्रग्स से मुक्त हो गई हूं।

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