भारत में इस जगह आज भी रोज हजारों लोग सिर्फ 50 रुपए में खाते है शुद्ध देसी घी से बना खाना, जूठा छोड़ने वाले को करना पड़ता है यह काम


मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में एक भोजनालय में मात्र 50 रुपए में शुद्ध देसी घी से बने खाने को हर कोई खाना चाहता है, लेकिन इस भोजनालय का नाम एक और बजह से प्रचलित हो रहा है| भोजनालय के शख्त नियम है जिसके अनुसार अगर थाली में भोजन छोड़ा गया तो 101 रुपए जुर्माना भी लगाया जायेगा| खाने की व्यर्थ में बर्बादी को रोकने एक नई पहल करता यह भोजनालय हबीबगंज के पास स्थित जैन मंदिर के सामने है| यह सिस्टम शुरू होने के बाद अब यहां डस्टबिन में नाम मात्र की जूठन बच रही है जिसे गौशाला भेज दिया जाता है। व्यापारी महेंद्र अजमेरा (किराना) और रमेंद्र जैन (गल्ला) द्वारा शुरू की गई इस भोजन शाला में खाना खाने के बाद लोगों को अपनी थाली चैक करानी पड़ती है। डस्टबिन के पास दो लोग थाली चैक करते हैं। साथ ही यहां लाउडस्पीकर के माध्यम से लोगों को दाने-दाने की कीमत बताते हुए थाली में भोजन न छोड़ने की लगातार अपील की जाती है।

साथ ही यहां पर डस्टबिन में पड़ी जूठन ये बयां करती है, कि पेट भरने के बाद लोग भोजन का महत्व भूल जाते हैं, भोजन के बाद आपकी खाली थाली आपके भोजन के प्रति संस्कारों का प्रतीक है इस तरह के स्लोगन भी लिखे गए हैं। व्यवस्थापक विमल भंडारी ने बताया कि यहां मात्र 50 रुपए के कूपन पर एक व्यक्ति को भरपेट भोजन मिलता है। इस भोजनशाला में रोजाना करीब एक हजार लोग भोजन करते हैं। शुरूआत में दिनभर में यहां आठ बड़े डस्टबिन जूठन से भर जाते थे। अन्न की इस तरह की बरबादी देखने के बाद ही भोजन करने वालों की निगरानी का काम शुरू किया गया। यहां दान पेटी भी रखी गई है। थाली में जूठन छोड़ने वालों से जुर्माना स्वरूप हाथ जोड़कर 101 रुपए दान पेटी में डालने को कहा जाता है। यह नियम लागू होने के बाद अब दिन भर में बमुश्किल आधा डस्टबिन ही जूठन निकल रही है। उसे गौशाला भेज दिया जाता है। दिगंबर जैन समाज के पर्यूषण पर्व शुरू होने पर यहां सोला का भोजन शुरू कर दिया जाता है। इसके तहत परोसने वाले भी शुद्धि के वस्त्र पहनते हैं। श्रावकों के लिए जवाहर चौक स्थित मंदिर से कुआं के पानी का इंतजाम किया जाता है और भोजन करने की व्यवस्था लकड़ी के पीठे पर की जाती है।

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