अटारी-वाघा सीमा पर दोनों मुल्कों के छठी बार बदलेंगे गेट, दोनों ओर के दर्शक देख सकेंगे रिट्रीट सेरेमनी


अटारी-वाघा सीमा पर दोनों मुल्कों की तरफ से लगे गेटों को एक बार फिर बदला जाएगा। इसका मुख्य मकसद दोनों तरफ के दर्शकों को एक-दूसरे की रिट्रीट सेरेमनी देखने की सुविधा प्रदान करना है। इस संबंधी में फैसला बीएसएफ तथा पाक रेंजर्स के डायरेक्टर जनरल की दिल्ली में हुई बैठक में लिया गया था और इनको अगस्त के आखिर तक स्थापित किया जाएगा।

दोनों तरफ के गेटों को स्लाइडिंग शक्ल में लगाया जाएगा – बीएसएफ अमृतसर सेक्टर के डीआईजी जेएस ओबराय के मुताबिक भारतीय गेट और पाकिस्तानी गेट का डिजाइन अलग-अलग है। दोनों आड़े तिरछे होने के कारण भारत के लोग पाकिस्तानी रेंजर्स की और पाकिस्तान के लोग भारतीय बीएसएफ की परेड नहीं देख पाते। यहां लगे पिलर भी मोटे होने के कारण दर्शकों को देखने में रुकावट पैदा करते हैं। उन्होंने बताया कि दोनों तरफ के गेटों को स्लाइडिंग शक्ल में लगाया जाएगा। पिलरों की गोलाई कम होगी। इसके साथ ही दोनों की डिजाइन भी एक जैसा रहेगा। गेटों के पास ही दोनों मुल्कों के अपने-अपने ध्वज होंगे। इससे पाकिस्तान बीएसएफ का और भारतीय पाक रेंजर्स की परेड आसानी से देख सकेंगे।

11 अक्टूबर, 1947 को ड्रम से बना था पहला गेट – चूंकि 11 अक्टूबर, 1947 को लार्ड माउंटबेटन के कहने पर एडवोकेट सीरियस रेडक्लिफ ने बार्डर लाइन खींची लेकिन यह भी कागजों में ही रही। बीएसएफ अधिकारियों के मुताबिक 9 अक्टूबर को यहां पर दोनों तरफ की फौजों की बटालियनें लगीं। भारत की तरफ से ब्रिगेडियर महिंदर सिंह चोपड़ा तथा पाक की तरफ ब्रिगेडियर नासिर अहमद वहां तैनात हुए। महिंदर सिंह के बेटे पुष्पिंदर सिंह चोपड़ा बताते हैं कि लाइन की पहचान के लिए उनके पिता के कहने पर दोनों तरफ एक-एक ड्रम लगाया गया और चूने की लकीर बना कर उनको गेट के पिलर की शक्ल में खड़ा कर दिया गया। यही था अटारी-वाघा का पहला गेट।

1958 में तैनात हुई पुलिस – 1958 में यहां पुलिस चौकी स्थापित हुई तो आने-जाने वालों से पूछताछ होने लगी। इसके बाद 1965 में जब बीएसएफ का गठन हुआ तो इसकी जिम्मेदारी बीएसएफ को सौंपी गई। इस दौरान वहां बांस का बेरीकेड्स लगा दिया गया और तभी से रिट्रीट सेरेमनी का सिलसिला भी शुरू हुआ।

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