भारत के जंगलों में बसा है ये कस्बा, यहां ना कोई सरकार है, ना पुलिस – देखें तस्वीरें


यहां रहने वाले लोगों में 43 देश के ट्रैवलर्स और टूरिस्ट्स हैं। इनके पास यहां रहने की वजह है क्योंकि धरती पर इसके जैसी कोई जगह नहीं है। क्लामर ने बताया कि यहां रहने आने वाले लोगों के बीच एक चीज कॉमन है कि वो यहां आने के बाद अपना पुरानी जॉब नहीं करते। मतलब ये है कि यहां अलग-अलग बैकग्राउंड के लोग रह रहे हैं। लेकिन इन सबने यहां आने के बाद अपना प्रोफेशन पूरी तरह से बदल लिया है।

यहां आकर रहने वाला डॉक्टर वेस्ट मैनेजमेंट और टाउन प्लानिंग का काम कर रहा है। वहीं, इसी तरह बाकी लोग अलग जिम्मेदारियां संभाल रहे हैं। क्लामर का कहना है कि इतने साल में टाउन और भी ज्यादा सामान्य हो गया है। यहां पर बहुत यूनिक मकान बने हैं, जिसमें लोग रहते हैं। उनके मुकाबिक, जगह की कमी के चलते लोग अब यहां अपार्टमेंट कॉम्पलेक्स बनाकर रह रहे हैं। वो वर्क योगा में वक्त बिताते हैं। क्लामर ने बताया कि यहां पर हर कोई आपस में खुलकर बात करता है। उन्होंने यहां की फोटोग्राफ्स को गुड मॉर्निंग ऑरोविले नाम की बुक में कम्पाइल किया है, जिसमें यहां के लोगों की स्टोरीज भी हैं। यहां ना कोई सरकार है ना ही पुलिस

स्प्रिचुअल लीडर मीरा अल्फस्सा ने 1968 में ऑरोविले टाउन की नींव रखी। उन्हें द मदर के नाम से भी जाना जाता है। इसे मानवता के लिए शांति और विकास की जगह के तौर पर शुरू किया गया। उसके मिशन स्टेटमेंट के तहत, वो ऑरोविले को यूनिवर्सल टाउन बनाना चाहते हैं, जहां सभी देशों के महिला और पुरुष शांति और प्रगतिशील माहौल में रह सकें। ये सब राजनीति और राष्ट्रीयता से दूर हो।

ऑरोविले टाउन की स्थापना का मकसद मानवीय एकता को महसूस करना है। मीरा ने इस टाउन को दुनिया भर के 50 हजार लोगों के शहर के तौर पर तैयार किया। उनके दिमाग में ऐसे टाउन का ख्याल 1930 में ही आया था। उन्होंने 1960 में इसे भारत सरकार के सामने रखा।

1966 में हुई यूनेस्को की जनरल एसेंबली में इस प्रोजेक्ट का समर्थन किया गया। इसके दो साल बाद 28 फरवरी 1968 में इसका एनॉग्रेशन हुआ। इस सेरेमनी में टाउन में सेंटर में मौजूद बरगद के पेड़ के पास 124 देशों के करीब 5000 लोग इकट्ठा हुए थे। वो अपने देश की मिट्टी भी साथ लेकर आए थे, जिसे कमल के शेप के कलश में रखा गया है।

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