मौत के पहले वीरप्पन ने ट्रिम की थी मूंछ, यूं हुआ था खूंखार डकैत का एनकाउंटर


veerappan-encounter-story

यह कहा जाता है कि चंदन तस्कर वीरप्पन खूंखार होने के साथ-साथ तेज दिमाग का भी था। यही वजह थी कि उस तक पहुंचने के लिए तीन राज्यों की पुलिस और आर्मी को तीस साल से ज्यादा वक्त लगा। बता दें कि उसे 18 अक्टूबर 2004 को तीन साथियों के साथ तमिलनाडु के धरमपुरी जिले में आने वाले पपरापत्ति जंगल में एनकाउंटर में मारा दिया गया था। कैसे फंस गया था तेज दिमाग वाला वीरप्पन पुलिस की जाल में…
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एनकाउंटर में वीरप्पन के मारे जाने की सबसे बड़ी वजह मोतियाबिंद था।
– दरअसल, उसे मोतियाबिंद हो गया था और इलाज के लिए उसे दो साथियों के साथ पपरापत्ति के जंगल से बाहर निकलना पड़ा था।
– खुफिया सूत्रों से इसकी जानकारी उसे पकड़ने के लिए ऑपरेशन चला रही तमिलनाडु एसटीएफ के हाथ लग गई।
– इसके बाद एक प्लान के तहत एसटीएफ ने एक एम्बुलेंस जंगल में भेजी जिस पर सलेम हॉस्पिटल लिखा था।
– पुलिस को धोखा देने के लिए वीरप्पन ने अपनी मूंछे ट्रिम कर ली और साथियों के साथ मोतियाबिंद का इलाज कराने एम्बुलेंस में सवार हो गया।

इस तरह हुआ था एनकाउंटर…

– एसटीएफ ने वीरप्पन के हॉस्पिटल जाने वाले रास्ते में एक ट्रक खड़ा किया, जिसमें हथियारों से लैस 22 एसटीएफ जवान मौजूद थे।
– एम्बुलेंस के ट्रक के पास आते ही एसटीएफ ने उसे हाथ देकर रोका और माइक पर वीरप्पन को सरेंडर करने कहा गया।
– दूसरी बार सरेंडर करने का अनाउंसमेंट होते ही एम्बुलेंस चला रहा एसटीएफ का अंडरकवर जवान गाड़ी से नीचे उतर गया।
– इसके बाद वीरप्पन और उसके साथियों ने एम्बुलेंस के अंदर से ही फायरिंग शुरू कर दी।
– मौका पाते ही एसटीएफ ने एम्बुलेंस के अंदर ग्रेनेड फेंका और जवानों ने गोलियां दागनी शुरू कर दी।
– वीरप्पन के सिर में गोली लगी और उसकी मौके पर ही मौत हो गई, जबकि तीन साथी गोलियां बरसाते रहे और वे भी अंत में एनकाउंटर में मारे गए।

आगे की स्लाइड्स में देखें वीरप्पन के एनकाउंटर के बाद की PHOTOS और पढ़ें कैसे शुरू हुआ जंगल का बादशाह बनने का सफर…


LEAVE A REPLY